Thursday, August 27, 2026

रक्षा बंधन

रक्षा बंधन 



माँ, इस बार मैं किसे राखी बाधूँगी ? नन्ही आशा ने प्रश्न भरी नज़रों से जब उसकी तरफ़ देखा तो सीमा के दिल में एक हूक सी उठी। उसका कोई भाई नहीं था, इसकी याद वह हर वर्ष राखी पर दिला देती थी। सीमा भी अपने घर में अकेली थी और उसका पति राजेश भी, इसलिए कोई चचेरा, ममेरा भाई या बहन भी नहीं थे।इसके पहले वे लोग जिस शहर में रहते थे, मकान मालिक के छोटे बेटे को राखी बाँधकर आशा कितनी खुश हुई थी। इस शहर में वे नये-नये आये थे। माँ को चुप देखकर आशा ने उसकी बाँह पकड़ कर हिलाई, तो अचानक जैसे उसे कोई अनोखा हल मिल गया। उसने आशा को अपने साथ आने को कहा और बाज़ार ले जाकर एक दर्जन राखियाँ ख़रीद लीं। मिठाई का एक डिब्बा भी लिया और उनकी कालोनी से सटे उस इलाक़े में जा पहुँची, जहाँ मज़दूरों के घर बने थे। नन्हे-नन्हे कुछ बच्चे वहाँ खेल रहे थे, आशा ने उनकी तरफ़ देखा तो वे भागकर आ गये। उनकी नन्ही कलाइयों पर राखी बाँधते हुए आशा कितनी खुश लग रही थी; और सीमा उसे देखते हुए संतुष्ट थी।  


Friday, August 21, 2026

सागर में इक लहर उठी

भाई के जन्मदिन पर 

ढेर सारी शुभकामनाओं सहित 


मौसम वर्षा का अति भाया है 

पूरे परिवार के संग मिलकर इस बार 

जन्मदिवस अनोखा मनाया है !

नाती की मुस्कान ने उसमें चार चाँद लगाये 

समधियों का आगमन भी 

हर्ष का सबब बनकर आया है !

मनभावनी हरियाली में 

सुबह-शाम स्वच्छ रास्तों पर टहलना 

कभी-कभी दर्शनीय स्थलों पर 

भ्रमण करना 

जीवन अपने मनहर रूप में 

सम्मुख आया है !

तुम्हारे जन्मदिन पर 

हम सभी ने यह गीत गाया है !

सागर में इक लहर उठी……

सदा उस अनाम का आशीष पाया है ! 

 

Monday, August 17, 2026

सरल जीवन का सुख निरन्तर

जन्मदिन पर

ढेर सारी शुभकामनाओं सहित 



जीवन के सातवें दशक में 

 बस थोड़ा-सा सुकून चाहिए,

थम गयी तीव्र जीवन की गति 

 अब उत्सव का न शोर चाहिए !

 

अब कदम कुछ धीरे चलते 

 शायद उम्र ने सिखा दिया है,

 जब जीवन स्वयं धीरे बीते 

जल्दी में रखा भी क्या है !


न दूर कहीं जाने की इच्छा

 न स्वादिष्ट व्यंजनों की चाह, 

 न नए वस्त्रों का आकर्षण,

 न दिखावे की कोई परवाह ! 


जो भी मिला वह है पर्याप्त

 जो है निकट वही है सुंदर,

 अब यह ह्रदय चाहता केवल 

 सरल जीवन का सुख निरन्तर !


कभी दुनिया जीतने की जो

इक ख्वाहिश दिल में पलती थी,

 आज बंद करके वह आँखें 

  भीतर ही उतरना चाहती !


 कुछ पल बैठ ध्यान में ख़ुद से

  मिलना अब अच्छा लगता है,

 मौन की उस शीतल छाँव में

 मन को अपना घर मिलता है !

अब शिकायतें कम हो गयी हैं

    अच्छे वैसे लोग हैं जैसे,

 कम हुई हैं अपेक्षाएँ भी

  लेना-देना नहीं किसी से !


जन्मदिवस पर आज हृदय में 

 कोई नहीं कामना जगती,

   शेष वर्ष संतोष में बीतें

 रहे प्रेम और मन में शांति !


 नित शांत भोर में भ्रमण करें 

साँस कृतज्ञता से भरी हो,

घर का हर कोना स्वच्छ हो 

हर शाम प्रार्थना-सी ढली हो !


स्वीकारा सुख से परिवर्तन 

उम्र बढ़ रही तो बढ़ने दो,

गरिमामय बने हर मुद्रा 

बालों में चाँदी उतरने दो !


  चेहरा नहीं, आईने में,

 जीवन का अनुभव देखना,

  धन्यवाद कहना है कल को 

नहीं दौड़ना अब बस चलना !

 

 पाना नहीं, केवल जीना है

नहीं बोलना अब सुनना है,

मन है शांत,
हृदय संतुष्ट   

जीवन के संग बहना है !

 

जब जीवन की संध्या आए,

 मुस्कुराते हुए कहना है,

“मैंने जीवन भरपूर जिया”,


शेष यहीं समर्पित करना है !