पापा जी की दूसरी पुण्यतिथि पर
विनम्र श्रद्धांजलि
दो वर्ष बीते कहने को
लगता है यह कल की बात,
घेर आपको सब बैठे थे
आने को थी अंतिम रात !
इधर-उधर की बातें करते
कापी-कलम लिया हाथ में,
अस्पष्ट सी लिखाई लेकिन
थी स्पष्टता हर बात में !
चाय का घूँट वह अंतिम
अंतिम था रात्रि का भोजन,
अर्ध रात्रि को हाथ जोड़कर
जैसे किया आख़िरी निवेदन !
कितने पाठ सिखा गया है
शांतिपूर्ण था वह प्रस्थान,
अंतिम घड़ी में था अधरों पर
उसी परमशिव, ब्रह्म का नाम !
जीवन का हर पल पावन था
मृत्यु भी ऐसी ही पायी,
प्रिय पापाजी सदा आपने
सहज-सजग रह शांति पायी !
आज स्मरण आते हैं वे पल
मोबाइल पर की चर्चाएँ,
जीवन इक अमोल अवसर है
स्मरण आपका याद दिलाये !


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