नये वर्ष में प्रस्तुत है एक नया ब्लॉग....इस ब्लॉग में वे कविताएँ है जो अपने मित्रों सम्बधियों के लिये खास तौर से लिखी गयी हैं, जन्मदिन , विवाह, विवाह की वर्षगाँठ, विदाई आदि के मौकों पर लिखी ये कवितायें शायद आपको भी किसी अपने की याद दिला दें.
Wednesday, January 8, 2025
प्रेम का आकाश
Tuesday, December 3, 2024
कितने दिन थे राम के पास
जन्मदिन पर
बीता बरस जन्मदिन आया
नदी समय की बहती जाती,
बड़े मज़े की बात यही है
हर बार यही धड़कन गाती !
कौन देखता रहकर भीतर
समय बीतता वही न बीते,
बरसों में यह तन शिथिल हुआ
पर मन के घट कभी न रीते !
स्वप्न समान सभी अनुभव अब
इस पल जाग जरा देखें हम,
जाता हुआ वर्ष यह कहता
क्या करना क्या नहीं करो तुम !
हर पीड़ा गहराई देती
हर आनंद नूतन विश्वास,
कितने दिन माया ने घेरा
कितने दिन थे राम के पास !
बदली भरे कई दिन आये
कितने सूरज चमके नभ में,
कई अडिग संकल्प भी लिए
बिटिया की शादी में उनमें !
भीतर गहन मौन भी देखा
बाहर दुनिया-देश घूमते,
हर मुश्किल का हल भी सूझा
मन जब था अंतर उत्सव में !
Thursday, November 28, 2024
घुल मिल गये जैसे नीर-क्षीर
प्रिय पुत्र व पुत्रवधू के लिए
संग-संग जीवन का वादा, दिल में फूटीं थीं फुलझड़ियाँ !
आशीर्वाद पाया बड़ों का, रिश्तों में प्रेम लहराया !
वरमाला डाली थी उस दिन, अहसास हर पल हो रहा !
घुल मिल गये जैसे नीर-क्षीर, अब दो मिल गये माता-पिता !
दोनों के जॉब की खूबियाँ, स्वीकारी हैं पूरे दिल से !
पहले दो थे एक हुए फिर, भेद नहीं कोई रहता है !
एक इकाई बन कर रहते, मेरा सब कुछ हुआ तुम्हारा !
पहला दूजे के सुख-दुख में, पूरे दिल से साथ निभाता !
हँसी सदा झलके मुखड़े पर, कोई बड़ा न कोई छोटा !
Monday, September 23, 2024
सच हो जायें सारे सपने
जन्मदिन पर
ढेर सारी शुभकामनाएँ
बरसा होगा नीर गगन से
भीगा-भीगा मौसम होगा,
तुम आयीं थीं जिस दिन जग में
कितना सुंदर दिन वह होगा !
तुम्हें बधाई इस शुभ दिन की
यही कामना सदा हमारी,
मन महके हर दिवस वर्ष के
खिली रहे बगिया तुम्हारी !
स्वप्न सजे हैं पलकों पर जो
होंठों पर जो गीत हैं रुके,
सच हो जायें सारे सपने
गीत सदा आँगन में गूंजे !
तुम दीप शिखा सी शोभित हो
हर तरफ़ उजाला बिखराओ,
सदा हँसो शीतल निर्झर सी
पीड़ा में भी बस मुस्काओ !
हर वर्ष दिवस यह आता है
संग लिए बचपन की स्मृतियाँ,
फिर याद कर दिला जाता है
बीते जीवन की कुछ कड़ियाँ !
हर वर्ष मनाओ जब यह दिन
तुम याद हमें भी कर लेना,
सुंदर बधाइयाँ फूलों से
पत्तों, सूरज से ले लेना !
Tuesday, September 3, 2024
घर आये थे अरमान लिए
भांजे के लिए जन्मदिन पर
घर आये थे अरमान लिए
फिर झेला क़हर बादलों का,
जब घुस आया घर में पानी
कोना भी बचा था न सूखा !
भाई-बहनों संग धूम मची
फिर इक-इक कर सब विदा हुए,
कुछ वक्त बिताने और साथ
हम चारों फिर भी यहीं रहे !
माँ पापा की अब उम्र हुई
देह शिथिल पर दिल अभी जवां,
हँसते-हँसते हर कष्ट सहा
घर में सदा ख़ुशियों का समाँ !
Friday, August 9, 2024
उनके स्नेह की दृढ़ डोर से
प्रिय ब्लॉगर मित्रों, पिछले माह के अंतिम सप्ताह में पिताजी ने देह त्याग दी। आज तीन सप्ताह के बाद ब्लॉग खोला है, पर लगता है जैसे एक युग बीत गया।
उनके स्नेह की दृढ़ डोर से
शब्दों में सामर्थ्य नहीं है
जो परिभाषित कर सकें उन्हें,
सम्मान और स्नेह लुटाकर
उर स्मरण आज कर रहा जिन्हें !
अनुशासन, दृढ़ इच्छा शक्ति
दो स्तंभों पर खड़ा था जीवन,
यम-नियम साधा हर क्षेत्र में
व्यर्थ नहीं व्यय किया कभी क्षण !
एक विशाल वटवृक्ष सा ही
व्यक्तित्तव था पापा जी का,
जिसकी छाया में पलता था
छह भाई-बहनों का कुनबा !
माँ की कमी नहीं खलने दी
ममता सब पर सदा लुटायी,
कठिन श्रम मेहनत के बल पर
क़िस्मत सुंदर स्वयं बनायी !
उनके स्नेह की दृढ़ डोर से
बँधे हुए थे सभी सुरक्षित,
अब लगता यह कहाँ गया है
शांत सहज आनन वह पुलकित !
वर्षों से वे बने हुए थे
रचनाओं के पहले पाठक,
सहज प्रेरणा स्रोत बने हैं
माँ जैसे प्यारे अभिभावक !
बड़े धैर्य से लड़ा उन्होंने
अंतिम युद्ध रोग से अपने,
डाले नहीं कभी हाथियार
जीवन जीया बल पर अपने !
देह का दर्द रोक न पाया
संगीत से लगाव पुराना,
विविध-भारती पर वर्षों से
बड़े भाव से सुनते गाना !
रस-सौंदर्य की परख अति थी
चेहरे पर सौम्यता छायी,
जो भी आया भेंट उसे दी
भक्ति ह्रदय में सदा समायी !
जहाँ कहीं हैं आप सुनेंगे
श्रद्धा सुमन समर्पित करते,
हैं अनंत पर थोड़े से ही
मन के भाव शब्द में भरते !
Thursday, July 11, 2024
लुटाते रहो विश्वास और प्रेम मन का
पुत्र के
जन्मदिन पर
आकाश में उड़ता तुम्हारा जहाज़
केवल जहाज़ नहीं है
यह तुम्हारे दिल की पुकार है
जो उड़ना चाहता है दूर अंतरिक्ष में
जिसे नहीं भाते दुनिया के संकरे रास्ते
जो अपनी अनंत पहचान पाना चाहता है
जो हवाओं और खुले आकाश के साथ एक हो जाता है
नये-नये ज्ञान-विज्ञान सीखने को आतुर तुम्हारा मन
केवल कौतूहल नहीं पाना चाहता
वह भर जाना चाहता है विस्मय से
इस ब्रह्मांड की शक्तियों के विभिन्न रहस्यों से
हर बात को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने की तुम्हारी चाह
केवल शाब्दिक समझ नहीं है
वह व्यवस्था के प्रति तुम्हारा भीतरी आग्रह है
जो मिटा देना चाहता है हर अव्यवस्था
ताकि सुंदर बने जीवन का हर पल, हर घड़ी
तुमने भर दिया है हमारे जीवन को उपहारों से
किताबों और नये से नये साधनों से
बदल रही है जैसे भूमिका
सन्तान और माता-पिता की
तुम्हारा अनकहा प्रेम व्यक्त होता है
उन रसीले फलों की मिठास में
हर सप्ताह होने वाली तुम्हारी उपस्थिति में
ऐसे ही यह साथ सजीला बना रहे जीवन संगिनी का
लुटाते रहो विश्वास और प्रेम मन का
सभी रिश्तों पर !



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